Kasis..


 ज़िन्दगी का हर पल ढलता चला जा रहा है और हम यूँ ही आस सजाये बैठे है.

कब नयी सुबह होगी ..न जाने कितने सूरज आये और चले गए..हमे पता ही न चला..

क्यू की हमारी आँखे तो बंद थी.उसमे न ही सूरज की गलती थी न समय का ही दोष था..

अगर था तो बस उन आँखों और आस ka था जो इक दुसरे से ताल मेल न बिठा सकी.

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